
स्वतंत्र इच्छा और हम वास्तव में कितने स्वतंत्र हैं
स्वतंत्र इच्छा क्या है?
स्वतंत्र इच्छा पहले की घटनाओं से स्वतंत्र होकर किसी कर्म को चुनने की क्षमता है।
डोमिनो की एक पंक्ति की कल्पना करें। अगला डोमिनो क्या करेगा, यह उसके द्रव्यमान और स्थिति जैसी स्थिर दशाओं तथा उससे पहले गिरने वाले डोमिनो से तय होता है।
यदि हमारे पास किसी क्षण की सारी आवश्यक जानकारी हो, तो हम सिद्धान्ततः अगली घटना का ठीक अनुमान लगा सकते हैं।
लेकिन यदि कोई डोमिनो पिछली घटनाओं से स्वतंत्र होकर अनेक सम्भावनाओं में से स्वयं चुन सके, तो उसके अगले व्यवहार को निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकेगा। तब हम कहेंगे कि उसमें स्वतंत्र इच्छा है।
क्या हमारे पास स्वतंत्र इच्छा है?
क्या हम सोचने, निर्णय लेने और चुनने के लिए सच में स्वतंत्र हैं, या पहले से तय विकल्पों को केवल निभा रहे हैं?
एक ही प्रकार के दो कैलकुलेटरों को चालू करके उनसे यादृच्छिक संख्याएँ बनवाएँ तो वे समान क्रम दे सकते हैं। वे संख्याएँ वास्तव में छद्म-यादृच्छिक होती हैं। सम्भव है कि हम भी कुछ अर्थ में उन कैलकुलेटरों जैसे हों।
पसंदीदा भोजन, रंग या कार के प्रश्न पर व्यक्ति केवल उसी विकल्प का नाम ले सकता है जिसे उसने पहले कभी देखा या सुना हो।
अतीत भविष्य को निर्धारित कर सकता है। हम चुनने की क्रिया देखते हैं, पर सम्भव है कि चुनाव पहले ही तय हो चुका हो।
हमारा मस्तिष्क संसार का भाग है और उसी के नियमों पर काम करता है। इसलिए स्वयं को चुनाव करते देखने का अनुभव वास्तविक हो सकता है, जबकि पूरी घटना पूर्वनिर्धारित हो।
यदि संसार की ठीक वही आरम्भिक अवस्था लेकर हमारे अस्तित्व का कंप्यूटर-अनुकरण चलाया जाए और बीच में कुछ न बदला जाए, तो क्या वह वर्तमान की बिल्कुल वही अवस्था तक पहुँचेगा? यदि हाँ, तो स्वतंत्र इच्छा नहीं, केवल उसका भ्रम होगा।
क्या स्वतंत्र इच्छा केवल भ्रम है?
हमें लगता है कि हम ज्ञात विकल्पों में से कोई भी चुन सकते हैं, पर किसी एक को चुनने की क्रिया पहले से निर्धारित हो सकती है।
सिक्का उछालकर पहले बल्लेबाजी या गेंदबाजी चुनना यादृच्छिक लगता है, पर सिक्के का परिणाम भी उससे पहले की भौतिक घटनाओं से तय होता है।
इस अर्थ में स्वतंत्र इच्छा भ्रम हो सकती है।
क्या तब हम अपने कर्मों के लिए जिम्मेदार नहीं हैं?
शायद हम स्वतंत्र नहीं हैं, फिर भी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। चुनाव और उसके परिणामों का अनुभव हमें ही जीना है, चाहे चुनाव पहले से तय हो।
कोई रेलगाड़ी के सामने खड़ा होकर यह चिल्लाते हुए नहीं बच सकता कि “चुनाव पहले ही हो चुका है।” उसे परिणाम जीना होगा।
दंड की नैतिकता क्या है?
यदि स्वतंत्र इच्छा नहीं है, तो अपराधी उस अपराध के लिए कितना जिम्मेदार है जिसे वह न करने के लिए स्वतंत्र ही नहीं था? यह प्रश्न दंड को केवल बदला मानने के बजाय सुरक्षा, रोकथाम और सुधार के रूप में सोचने को कहता है।
क्या हमें परिणामों की चिंता करनी चाहिए?
परिणाम पहले से तय हो सकता है। फिर भी हमें किसी परिणाम की इच्छा करनी होगी, तभी हम उस तक पहुँचाने वाले मार्ग पर चलेंगे।
इसलिए चिंता की भूमिका भी है और सीमा भी। लक्ष्य पर ध्यान दें और परिणाम की उतनी चिंता करें जितनी सही मार्ग दिखाने के लिए आवश्यक हो। उससे अधिक चिंता निरर्थक और हानिकारक है; वह हमें मार्ग से भटका सकती है।
परिणाम की चिंता भविष्य के परिणाम का कारण हो सकती है। स्वतंत्र इच्छा के भ्रम को जानना यह भी याद दिलाता है कि हम अतीत बदल नहीं सकते और शायद कभी बदल भी नहीं सकते थे।
यह गीता की शिक्षा के निकट है—एक प्रमुख हिंदू ग्रंथ, जिसे अन्य पुस्तकों की तरह मनुष्यों ने लिखा:
“तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में नहीं। स्वयं को कर्मफल का कारण मत मानो और अकर्मण्यता से भी मत जुड़ो।”
— गीता 2.47
तब यह सब क्या है?
सम्भव है कि हमारा अनुभव पहले से रिकॉर्ड की गई फिल्म का केवल पुनरावर्तन हो।
हिंदू दर्शन की माया—अर्थात भ्रम—की धारणा इसके निकट लगती है।
उस फिल्म का निर्देशक कौन है?
शायद आप स्वयं।
निर्देशक और फिल्म एक-दूसरे में मिले और अविभाज्य दिखाई देते हैं। हिंदू दर्शन में इसे अद्वैत या गैर-द्वैत की धारणा से समझा जाता है।


